मंज़िलें और भी हैं
"नहीं आज नहीं।" कहता हुआ वह आगे बढ़ गया। 'बार' के बाहर खड़ा गार्ड भी हैरान था, सातों दिन पीने वाला शख्स आज बिना पिये जा रहा था।
वह आगे बढ़ता गया लेकिन उसके मन-मस्तिष्क में बेटी की बात घूम रही थी। "पापा, आज आप ड्रिंक नहीं करेंगें और चर्च में हमारे लिए 'प्रेयर' भी करेंगें।"
आखिर वह उस दोराहे पर आ खड़ा हुआ, जहां से एक रास्ता रैन-बसेरे की ओर से जाता था। वहाँ के गंदे-अधनंगे बच्चों के कुछ मांगने के लिए पीछे पड़ जाने की आदत के चलते; वह उधर जाने से कतराता था। दूसरा रास्ता ‘सर्वशक्तिमान’ के दरवाजे पर जाता था जिस ओर जाना उसने महीनों पहले बंद कर दिया था क्योंकि ठीक एक वर्ष पहले उसके ख़ुद के हाथों हुई दुर्घटना में अपने परिवार को खोने का जिम्मेदार भी वह ‘उसे’ ही मानता था।
'क्या करे और क्या न करे' की स्थिति में वह कुछ देर सोचता रहा और फिर एक ठंडी सांस लेकर बुदबुदाते हुए रैन बसेरे की ओर चल पड़ा। "नहीं बिटिया नहीं! मैं जीवन भर भटकता रहूँगा इन्हीं गलियों में, लेकिन अब 'उधर' कभी नहीं जाऊँगा।". . .
"अरे बाबू, कछु खाने को दे ना।" जिस बात से वह डर रहा था, वही हुआ। रैन बसेरे के ठीक सामने शोर मचाते बच्चों में से कुछ बच्चों के साथ वह बच्ची भी उसकी टाँगों से आ चिपकी।
"अरे चलो, दूर हटो।" सहज प्रतिक्रिया वश उसने बच्चों को दूर धकेल दिया और तेज कदमों से वहाँ से निकल जाना चाहा, लेकिन नीचे गिरे बच्चों में से बच्ची के रोने की आवाज से उसके पाँव अनायास ही थम गए। "कहीँ लगी तो नहीं? बोल न, क्या खाएगी बिटिया?" वह ख़ुद भी नहीं जानता था कि आज ऐसा क्यों हुआ लेकिन कुछ क्षणों में ही वह उस बच्ची के साथ और बच्चों को भी ब्रेड लेकर बांट रहा था।
रोने वाली बच्ची अब मुस्करा रही थी और वह उसे एक टक देख रहा था। महीनों के बाद उसने आज 'नैंसी' को हँसते देखा था। "नैंसी मेरी प्यारी बेटी!" वह बुदबुदाया।
"क्या देख रहे हो पापा? आज मैं बहुत खुश हूं, आज आपने मेरी दोनों बातें मान ली।"
"पापा!. . . दोनों बातें।" वह जैसे सोते से जाग गया हो। "हाँ, मान ही तो ली मैंने दूसरी बात भी। ये ब्रेड खाते बच्चे भी तो नन्हें-नन्हें 'ईसा' ही हैं और ये बच्ची मेरी नैंसी।”
सुनो बेटी।" उसने जाती हुई बच्ची को पुकारा। "आज तुमने अपनी ही दुनियाँ में भटकते मुझ मुसाफ़िर को उसकी मंजिल का पता दे दिया है। थैंक्यू नैंसी, थैंक्यू. . . !"
बच्ची कुछ नहीं समझी पर वह मुस्कराता हुआ आगे बढ़ चला था।
. . . वीर !
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